Wednesday, March 7, 2012

सिनेमा में होली: बिसर गई होली, बिला गए रंग

होली लोक का त्यौहार है और सिनेमा लोक का माध्यम. लेकिन जबसे हिंदुस्तान ने नव उदारीकरण के घोड़े पर सवार होकर कुलांचे भरना शुरू किया और सिनेमा लोकल से ग्लोबल होने लगा, होली गायब होने लगी. वैसे ही जैसे छद्म आर्थिक विकास के नाम पर क्रिएट किए गए गुडी-गुडी माहौल में लोक और लोक जीवन की हलचलें दर किनार होने लगी. अब हिंदी सिनेमा में होली के रंग नहीं दिखते. लोक के इस माध्यम ने लोक के इस महापर्व को भुला दिया है. सिनेमा से होली बिसर गई है. होली के रंग बिला गए हैं.
होली प्रेम, मस्ती और उल्लास का त्यौहार है. इसका रंग कभी हमारी फिल्मों में जमकर बरसता था. फिल्मों में होली के दृश्य और गीत आम थे. दर्शकों को भी रंग खेलने का फिल्मी अंदाज खूब रास आता था. फिल्मों में होली की मस्ती दर्शकों को सिनेमा हॉल तक खींच लाती थी तो होली के गीत उन्हें इस लोकपर्व को मनाने का सिनेमाई अंदाज दे जाते थे. फिल्मकार भी कभी कहानी को आगे बढ़ाने के नाम पर तो कभी किसी और बहाने से होली के दृश्य और गीत अपनी फिल्मों में डालने के लिए उत्सुक रहते थे. बात अगर फिल्मों में होली के यादगार गीतों और दृश्यों की करें तो सबसे पहले 1944 में आई दिलीप कुमार की पहली फिल्म ‘ज्वारभाटा’ में होली का गीत फिल्माया गया था. तब ब्लैक एंड व्हाइट के जमाने में भी परदे पर रंगों का जादू दर्शकों को खूब भाया. इसके बाद तो सिलसिला चल निकला. ‘फूल और पत्थर’, ‘मदर इंडिया’, ‘नवरंग’, ‘गोदान’, ‘कटी पतंग’, ‘शोले’, ‘आप बीती’, ‘कोहिनूर’, ‘राजपूत’, ‘कामचोर’, ‘धनवान’ जैसी कई फिल्मों में होली के गीत और दृश्य दिखाई दिए. यहां तक कि ‘होली आई रे’ नाम से एक बार तथा ‘होली’ और ‘फागुन’ नाम से दो-दो बार फिल्में भी बनी. अभी कुछ साल पहले ‘कर्मा और होली’ नाम से भी एक फिल्म आई थी. फिल्मकारों में यश चोपड़ा ऐसे फिल्मकार रहे हैं, जिनकी ‘मशाल’, ‘सिलसिला’, ‘डर’, ‘मोहब्बतें’ आदि फिल्मों में होली का रंग जमकर बरसा है.
परदे पर होली को लेकर 80 के दशक तक फिल्मकारों का रूझान भरपूर दिखाई पड़ता है. इस दरम्यान सिनेमा ने होली के एक से बढ़कर एक खूबसूरत और मस्ती भरे गीत दिए. ‘लाई है हजारों रंग होली’ (फूल और पत्थर), ‘होली आई रे कन्हाई रंग छलके’ (मदर इंडिया), ‘अरे जा रे हट नटखट’ (नवरंग), ‘आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली’ (कटी पतंग), ‘नीला, पीला, हरा, गुलाबी’ (आपबीती), ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं’ (शोले), ‘सात रंग में खेल रही है’ (आखिर क्यूं), जैसे होली के फिल्मी गीत आज भी दर्शकों की स्मृतियों में ताजा हैं. लेकिन इन सिनेमाई गीतों में सबसे ज्यादा किसी गीत का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला तो वो अमिताभ बच्चन की आवाज में उनपर और रेखा पर फिल्माया गया ‘सिलसिला’ का गीत ‘रंग बरसे भीगे चुनरवाली वाली’ है. सिलसिला के तकरीबन दो दशक बाद बागबान में एक बार फिर अमिताभ बच्चन ‘होली खेले रघुबीरा’ गाते नजर आए. अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी पर फिल्माए गए होली के इस गीत को भी दर्शकों ने खूब पसंद किया. अपनी आनेवाली भोजपुरी फिल्म गंगा देवी के जरिए अमिताभ बच्चन एकबार फिर परदे पर रंग-गुलाल उड़ाते दिखाई देनेवाले हैं.
90 के दशक से फिल्मों से होली और होली के गीत गायब होने लगे. ये वो दौर था, जब भारत आर्थिक उदारीकरण के युग में प्रवेश कर रहा था. समाज और सामाजिकता पर बाजारवाद हावी होने लगा था. धीरे धीरे बाजार का शिकंजा कसता गया. और बाजार के लिए जब लोक का कोई महत्व नहीं है तो फिर लोक पर्वों को वो कैसे तरजीह देता. वो भी होली जैसे पर्व जिसमें व्यापार की गुंजाइश कम है. गौरतलब है कि होली की मस्ती में सराबोर होने के लिए धन के प्रदर्शन और खर्च की नहीं, दिल में प्रेम, उमंग और उत्साह की जरूरत होती है. बाजार के इस बढ़ते प्रभाव से सिनेमा भी अछूता नहीं रहा. सरहद को लांघ हिंदी सिनेमा अपने लिए वैश्विक बाजार की तलाश में निकल पड़ा, लेकिन सरहद के भीतर वो सिकुड़ता भी गया. नई सदी के शुरू होते होते सिंगल स्टोरी वाले विशुद्ध सिनेमा हॉल खत्म होने लगे. उनकी जगह मॉल और मल्टीप्लेक्स ने ले ली, जहां सिनेमा देखने के साथ पिज्जा-बर्गर, पॉपकॉर्न और कोल्ड ड्रिंक मिलने लगे. फिल्में भी भारत के आम दर्शकों के लिए नहीं, शहरी दर्शकों और ओवरसीज मार्केट को ध्यान में रखकर बनाई जाने लगीं. इसी दरम्यान सिने जगत को उद्योग का भी दर्जा मिल गया यानी सिनेमा पूर्णत: व्यावसायिक हो गया, जिसका मकसद सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाना था. ऐसे में लोकपर्व होली के लिए सिनेमाई जमीन को संकुचित तो होना ही था.
हालांकि इस दौरान ‘मोहब्बतें’, ‘बागबान’, ‘मंगल पाण्डेय’ जैसी चंद फिल्मों में होली के रंग जरूर दिखाई दिए, लेकिन अपवाद स्वरूप ही. वक्त के साथ परदे पर होली के रंग धूसर होते गए. आधुनिकता के नाम पर वेस्टर्न कल्चर के प्रति शहरी युवाओं के रूझान ने होली को फीका कर दिया. फिल्मकार भी होली से परहेज करने लगे. परदे पर होली नजर आई भी तो अपने सहज-स्वाभिवक मस्ती के रंग में नहीं, मॉडर्न बनने के चक्कर में कृत्रिमता का खोल ओढ़े हुए. कुछ साल पहले आई फिल्म ‘वक्त’ में होली का यही रुप देखने को मिला. ‘लेट्स प्ले होली’ गाते हुए नायक-नायिका वैसे ही रंग खेलते हैं, जैसे महानगरों में असली बारिश से बचते युवा डिस्को की धुन पर कृत्रिम बारिश में भीगने और बरसात का आनंद उठाने की नौटंकी करते हैं. लेकिन क्या ‘लेट्स प्ले होली’ से ‘आज न छोड़ेंगे हम हमजोली’ या ‘रंग बरसे भीगे चुनरवाली’ जैसे होली की मस्ती की सहज अभिव्यक्ति करनेवाले गीतों की भरपाई हो सकती है. यकीनन नहीं. और शायद इसीलिए आज भी होली के मौके पर लोकगीतों के साथ जब फिल्मी गीत बजते हैं, तो वो वही पुराने गीत होते हैं, जिनमें होली के रंग बरबस छलकते दिखाई देते हैं. फागुन की मस्ती जिनमें शबाब पर होती है. सिनेमा और जीवन से होली के रंग और होली के गीतों का यूं बिसरते जाना दुखद है. हमारे जीवन से होली नहीं गायब हो रही है, जीवन के रंग गायब होते जा रहे हैं और हम रंग विहीन- रस विहीन हाड़-मांस की मशीन में तब्दील होते जा रहे हैं. क्या होली के बगैर हमारा सिनेमा भी रंग और रस विहीन नहीं होता जा रहा है !
(ये आलेख सतरंगी संसार के मार्च अंक में प्रकाशित है)

Monday, December 5, 2011

अभिनय की नई परिभाषा गढ़ती बिंदास बालन


हिंदी सिनेमा में मौजूदा दौर की अभिनेत्रियों के बीच अगर तुलना की जाय तो विद्या बालन उनमें सबसे अलग और अलहदा कही जा सकती हैं. खूबसरत, बिंदास और संजीदा अभिनय की बेहतरीन बानगी. उन्हें परदे पर देखना अच्छा लगता है, क्योंकि वो अभिनय नहीं करती अपने किरदार में उतर जाती हैं. विद्या बालन खूबसूरत हैं और हिंदी सिनेमा के ट्रेंड के तहत किसी अभिनेत्री के कामयाब होने के लिए इतना काफी है. लेकिन ये ट्रेंड विद्या बालन पर लागू नहीं होता. बाकी अभिनेत्रियों की तरह बालन को रूपहले परदे की खूबसूरत गुड़िया बनने से परहेज है. और इसीलिए वो तभी किसी फिल्म में काम करने को राजी होती हैं, जब उन्हें किरदार में दम दिखाई पड़ता है. अगर रोल दमदार नहीं है तो वो बड़े से बड़े बैनर को ठुकराने में देर नहीं लगाती. विद्या ने विशाल भारद्वाज की फिल्म डायन इसीलिए छोड़ दी क्योंकि उनके मुताबिक फिल्म में उनके करने के लिए कुछ नहीं था.
डर्टी पिक्चर की कामयाबी ने विद्या बालन के करियर में एक और नगीना जड़ दिया है. वो अपनी समकालीन अभिनेत्रियों से कोसों आगे दिखाई देती नजर आ रही हैं. अभिनय में भी और बोल्डनेस में भी. जिस रोल को करने में बड़ी-बड़ी और नामचीन अभिनेत्रियों को पसीने छूटने लगते हैं, अपनी इमेज बिगड़ने का डर सताने लगता है. विद्या बालन वैसे रोल बेहद सहजता से निभा जाती हैं. साउथ की हॉट और सेक्स बम के रूप में मशहूर एक्ट्रेस सिल्क स्मिता की जिंदगी पर आधारित डर्टी पिक्चर इसका हालिया उदाहरण है. इस फिल्म में विद्या बालन ने काफी बोल्ड सींस दिए हैं. इतने कि फिल्म के रिलीज से पहले और बाद में भी उनके बेजोड़ अभिनय की चर्चा कम और बोल्डनेस की चर्चा ज्यादा हुई. ये बात सिर्फ डर्टी पिक्चर के साथ ही लागू नहीं होती, बल्कि सच तो ये है कि विद्या बालन तकरीबन एक दशक के अपने करियर में बेहतरीन अभिनय के लिए चर्चा में तो रही हीं, अपनी फिल्मों में दिए बोल्ड सींस के लिए भी वो कम चर्चित नहीं रही हैं. अपनी पहली ही फिल्म परिणीता में सैफ अली खान के साथ बेडसीन देकर उन्होंने खलबली मचा दी थी. बाद की फिल्मों में भी उनका ये बिंदास तेवर जारी रहा. कुछ साल पहले आई अभिषेक चौबे की इश्किया में भी अरशद वारसी और नसीरूद्दीन शाह के साथ उनके अंतरंग सींस ने काफी सुर्खियां बटोरी.
हालांकि अपनी फिल्मों में बोल्ड सींस को लेकर विद्या बालन का खुद का मानना है कि वो फिल्में बोल्डनेस के लिए नहीं, दमदार रोल के लिए करती हैं. उनकी फिल्में अश्लील नहीं होतीं, रोल की डिमांड के मुताबिक उन्हें बोल्ड होना पड़ता है. इश्किया के निर्देशक अभिषेक चौबे भी कहते हैं कि ‘विद्या रोल में जान डालने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं’. परिणिता हो, इश्किया या डर्टी पिक्चर इन फिल्मों में विद्या बालन द्वारा निभाया किरदार इसकी पुष्टि भी करता है. इसके अलावा पा, नो वन किल्ड जेसिका, भुल भुलैया जैसी फिल्मों में निखर कर आया उनका सुच्चा अभिनय भी ये प्रमाणित करता है कि बिंदास बालन को किसी एक सांचे में बांधकर पारिभाषित करना नामुमकिन है. वाकई विद्या बालन की फिल्में उनके दिए बोल्ड सींस के लिए नहीं, उनके उम्दा और काबिले तारीफ अभिनय के लिए याद करने लायक हैं.
डर्टी पिक्चर के बाद विद्या बालन का नाम अब सफलता की गारंटी भी बन चला है. गौरतलब है कि नसीरूद्दीन शाह, तुषार कपूर और इमरान हाशमी जैसे तीन तीन अभिनितेओं के होने के बावजूद डर्टी पिक्चर की चर्चा सबसे ज्यादा विद्या बालन को लेकर ही हुई. रिलीज होने के बाद भी दर्शक विद्या को देखने के लिए ही सिनेमा हॉल में उमड़े. इश्किया के साथ भी यही हुआ था. नसीरूद्दीन शाह और अरशद वारसी के होने के बावजूद फिल्म के हिट होने का क्रेडिट सबसे ज्यादा विद्या बालन के ही हिस्से में आया. यानी हिंदी सिनेमा में जहां नायिकाओं के हिस्से सुंदर दिखने और नायक का मन बहलाने के अलावा कोई और काम नहीं होता, विद्या अपने कंधों पर फिल्म को हिट कराने का भार सफलता से उठाती दिखाई दे रही हैं.
विद्या बालन ने अपने दम पर अपनी नई पहचान गढ़ी है. उन्होंने सिनेमाई अभिनेत्री को नए सिरे से संवारा सजाया है, उसे ग्लैमर डाल के खोल से बाहर निकाला है. वो अभिनय की परंपराओं को तोड़ने में यकीन रखती हैं. ऐसे में नए दौर के चर्चित फिल्मकार अनुराग कश्यप जब यह कहते हैं कि ‘विद्या बालन दूसरों को रास्ता दिखा रही हैं. हमें उनकी जरूरत है’, तो ये कथन अतिशयोक्ति भरा नहीं लगता. परिणिता से डर्टी पिक्चर तक, विद्या बालन के अभिनय के सफर को देखकर उम्मीद बंधती है कि आनेवाली फिल्मों में भी उनके अभिनय के कई शेड्स देखने को मिलेंगे. और हां हिंदी सिनेमा की कुछ और परंपराए भी जरूर टूटेंगी, इसकी भी उम्मीद बंधती है.

Wednesday, March 23, 2011

शहीदे आज़म की याद में

( 23 मार्च, भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव की शहादत का दिन... तीनों ने एक ही मकसद के तहत फांसी के फंदे को चूमा था और तीनों की शहादत किसी मायने में कम नहीं थी... लेकिन इन तीनों में भगत सिंह ज्यादा बौद्धिक और विचारवान थे... दरअसल भगत सिंह सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं, महान स्वप्नद्रष्टा भी थे... उनका लक्ष्य महज हिंदुस्तान को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराना नहीं था... उनकी आंखों में शोषणमुक्त और हर तरह की गैरबराबरी की नुमाइंदगी करने वाले आजाद हिंदुस्तान का सपना तिरता था... उनका सपना आज भी मरा नहीं है... और न ही उनके विचार... नव उदारीकरण के इस दौर में जब बाकी और गरीब भारत चंद अमीर मुट्ठियों का नया उपनिवेश बनता जा रहा है, भगत सिंह और उनके विचार आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं... शहादत दिवस के अवसर कुमार नयन की एक कविता के साथ शहीदे आज़म भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को श्रद्धांजली... आज भगत सिंह हमारे बीच होते तो शायद वही कहते जो उनके बहाने कुमार नयन ने लिखा है...)

पिघलेंगे पर खत्म नहीं होंगे


ईश्वर नहीं हूं न अतीत हूं इस देश का
मुझे मूर्ति में तब्दील कर
मेरा पूजनोत्सव करने वाले जड़वादियों !
मुझे फिल्मी कहानी बनाने वाले चतुर वाणिकों !
मत भूलो कि मैं इतिहास होकर भी इतिहास नहीं बना हूं अभी
वर्तमान हूं मैं और जिंदा हूं अभी
उसी सूली पर लटका हुआ
उतरा था जिस पर से कभी मेरा नश्वर शरीर
पर आग में तपे हुए मेरे शब्द
रह गये थे वहीं के वहीं
हवा नहीं हैं वे शब्द न बादल कि उड़ जायें कहीं
ठोस जमीन पर उगे हिमालय जैसे पहाड़ हैं वे
पिघलेंगे पर खत्म नहीं होंगे कभी
मुझ पर फूलों की बारिश मत करो
मत डालो मेरी प्रतिमा पर फूल मालाएं
मेरे नजदीक आओ साथियों
मुझसे पूछो कि मैं नास्तिक क्यों हूं
मुझे पढ़ो कि मैं इस अंधेरे के खिलाफ
क्या-क्या कर सकता हूं
मैं तुम्हारी ही तरह युवा स्वप्नदर्शी हूं साथियों
इसलिए मुझे प्रणाम मत करो
मुझे गलबंहिया दो, खेलो, हंसी ठट्टा करो मेरे साथ
मुझे अपने घर ले चलो और इत्मीनान से सोचो
क्यों मैं क्रांतिकारी हूं पर हिंसक नहीं
क्यों मेरे शब्द अभी तक जिंदा हैं
और क्यों हम आजाद नहीं हुए अभी तक
इन सारे रहस्यों की कुंजी हैं मेरे शब्द
अब जीवन नहीं, मेरे विचारों के दर्शन करो
खोलो मुझे परत-दर-परत और जानो
कि मैं बेचैन हूं किताबों से निकलकर
तुम्हारी आवाज में घुलने के लिए
आओ ! सूली से उतारो मुझे
और अपनी गर्म हथेलियों पर लेकर
उतर जाओ मुक्ति के महा संघर्ष में
-कुमार नयन

Tuesday, March 22, 2011

दो शहीदों की याद: भगत सिंह और पाश

कल यानी 23 मार्च भगत सिंह का ही नहीं, पंजाबी के मशहूर कवि अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की भी शहादत का दिन है... फर्क सिर्फ ये है कि भगत सिंह गुलाम भारत की आजादी की लड़ाई में शहीद हुए थे, जबकि पाश आजाद भारत में... पाश ने भ्रष्ट राजनीति से उपजी सरकारी तानाशाही और उसी से निकले खालिस्तानी आतंकवाद दोनों के खिलाफ अपनी कविताओं के जरिए आवाज बुलंद की थी... वे दोनों की आंख की किरकिरी बने हुए थे... 23 मार्च 1988 को खालिस्तानी उग्रवादियों ने महज उनकी हत्या कर दी... पाश उस समय महज 38 साल के थे... पाश और भगत सिंह दोनों वामपंथी विचारधारा के समर्थक थे... और हर तरह की गैर बराबरी और तानाशाही के खिलाफ... पाश भगत सिंह से काफी प्रभावित भी थे... 1982 में उन्होने शहादत दिवस पर शहीदे आजम की याद में एक कविता भी लिखी थी... पाश की उसी कविता से पाश और भगत सिंह दोनों को श्रद्धांजली... ये बताते हुए भी कि विचार कभी नहीं मरते... न भगत सिंह के मरे और न ही पाश के...

उसकी शहादत के बाद बाकी लोग
किसी दृश्य की तरह बचे
ताजा मुंदी पलकें देश मे सिमटती जा रही झांकी की
देश सारा बच रहा साकी
उसके चले जाने के बाद
उसकी शहादत के बाद
अपने भीतर खुलती खिड़की में
लोगों की आवाजें जम गयीं
उसकी शहादत के बाद
देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने
अपने चेहरे से आँसू नही, नाक पोंछी
गला साफ़ कर बोलने की
बोलते ही जाने की मशक की
उससे संबंधित अपनी उस शहादत के बाद
लोगों के घरों में
उनके तकियों मे छिपे हुए
कपड़े की महक की तरह बिखर गया
शहीद होने की घड़ी में
वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह निस्तेज नहीं था ।

Monday, March 14, 2011

कुछ यादें, कुछ बातें

मैंने चुराया था तुम्हारे लिए
कुछ धूप, कुछ चांदनी
कुछ सुबह, कुछ शाम
घर-परिवार और दोस्तों से थोड़ा वक्त
और खुद से अपने दिल का एक कोना
...लेकिन ये तुम्हारे कोई काम न आ सके
सारी चुराई चीजें रह गई मेरे पास
आज भी धरी हैं उसी तरह
और पड़ रही हैं जिंदगी पर भारी...

Saturday, March 5, 2011

बनारस… जिंदगी और जिंदादिली का शहर


(बनारस न मेरी जन्मभूमि है और न ही कर्मभूमि... फिर भी ये शहर मुझे अपना लगता है... अपनी लगती है इसकी आबो हवा और पूरी मस्ती के साथ छलकती यहां की जिंदगी... टुकड़ों-टुकड़ों में कई बार इस शहर में आया हूं मैं... और जितनी बार आया हूं... कुछ और अधिक इसे अपने दिल में बसा कर लौटा हूं... तभी तो दूर रहने के बावजूद दिल के बेहद करीब है ये शहर... मुझे लगता है कि आज की इस व्यक्तिगत महात्वाकांक्षाओं वाले इस दौर में, जहां पैसा ज्यादा मायने रखने लगा है, जिंदगी कम... इस शहर से हमें सीखने की जरुरत है...इस बार इसी शहर के बारे में...)

साहित्य में मानवीय संवेदनाओं और अनुभूतियों के नौ रस माने गये हैं... लेकिन इसके अलावा भी एक रस और है, जिसे साहित्य के पुरोधा पकड़ने से चूक गये... लेकिन जिसे लोक ने आत्मसात कर लिया... वह है बनारस... जीवन का दसवां रस... जिंदगी की जिंदादिली का रस... जिसमें साहित्य के सारे रस समाहित होकर जिंदगी को नया अर्थ देते हैं... जिंदगी को मस्ती और फक्कड़पन के साथ जीने का अर्थ... कमियों और दुख में भी जिंदगी के सुख को तलाश लेने का अर्थ़...
बहुत पुराना है बनारस का इतिहास... संभवतः सभ्यता के विकास से जुडा हुआ... बनारस की प्राचीनता का उल्लेख करते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार मार्क ट्वेन ने कहा है कि बनारस इतिहास से भी प्राचीन है... यहां तक कि किंवदन्तियों से भी... और यदि दोनों को मिला दिया जाय तो दोनों से प्राचीन... वेद-पुराणों से लेकर सभी धर्म ग्रन्थो में उल्लेख हुआ है बनारस का, अपने प्राचीन नाम काशी के मार्फत... महात्म्य इसका इतना कि सबसे बडे पुराण स्कन्द महापुराण में काशी महिमा को लेकर काशी खंड के नाम से एक अलग विभाग ही रच दिया गया... धर्मग्रन्थों में मोक्ष नगरी की ख्याति है इसकी... दूर दूर से आते हैं लोग यहां मृत्यु का आलिगंन करने... दुनिया में इकलौती जगह है यह जहां कहा जाता है कि मरने वाले को सीधे मोक्ष मिलता है क्योंकि बाबा विश्वनाथ मरने वाले के कान में तारक मंत्र देकर उसका उद्धार कर देते हैं...
बनारस महज एक शहर नहीं है... बल्कि उससे आगे बहुत कुछ है... जिंदगी का भरपूर फलसफा है बनारस... अड़भंगी, मस्त-मौला और हिन्दू धर्म के सबसे अनूठे देव भोलेनाथ की नगरी है बनारस... और यह साबित भी होता है यहां के लोक जीवन में मस्ती की मिठास को देखते हुए... दुनिया का इकलौता शहर है बनारस जहां के लोग स्यापे में नहीं, जीने में यकीन रखते हैं... बेफिक्री और बिंदासपने के साथ जिंदगी को जीने में... दुनिया के कोने कोने से लोग आते हैं, बनारस को देखने समझने...
जिंदगी को हर पल जीने का दर्शन गढने वाला बनारस मरने की तहजीब भी सिखाता है, ताकी जिंदगी का जश्न जारी रहे... यहां हर पल जीवन का स्पन्दन महसूस होता है, क्योंकि यहां मृत्यु का भय नहीं सताता... सदियों पहले बनारस ने कबीर के माध्यम से इस भय को नकार दिया था- हम न मरब मरिहैं संसारा...
अपनी बोली बानी और अंदाज से अनूठा और सबसे अलग शहर है बनारस... भोजपुरी यहां की पारपरिक और लोक की भाषा है... भोजपुरी के आदि कवि कबीर के शहर बनारस में भोजपुरी का रंग निराला है... अपनी मिठास के लिये मशहूर भोजपुरी का रंग बनारस की आबो हवा में घुलकर और खिल उठता है... तभी तो यहां की बोली में अनिवार्य रुप से शामिल गालियां भी किसी को आहत नहीं करती... बनारस ने अपनी शैली में भोजपुरी को विशिष्ट पहचान दिलाई है देश दुनिया में... क्योंकि भोजपुरी यहां महज एक भाषा नहीं जीवन शैली है... जीवन को जीने का ढंग है... भोजपुरी को एक अलग तेवर दिया है बनारस ने...
यदि भारत को किसी एक जगह खोजना है, तो बनारस ही वह जगह है जहां पूरा हिंदुस्तान दिखाई पड़ता है... यहां सारे धर्म, संप्रदायों के लोग बसते हैं... देश के कोने कोने से आए लोग मिल जाएंगे, यहां की परंपरा और संस्कृति में अपने को घोलते हुए... बनारस की अपनी परंपरा और अपनी संस्कृति रही है... बनारस ने परंपरा से कुछ सीखा है कि नहीं ये कहना भले मुहाल हो, कितुं परंपरा ने बनारस से अवश्य सीखा है और अपने को समृद्ध किया है, ये जरुर कहा जा सकता है... बाबा विश्वनाथ के शहर बनारस ने उनके फक्कड़पने के साथ जीने का जो ढंग अपनाया उसे मध्यकाल में कबीर ने प्रखर रुप दिया और जिसे भारतेन्दु, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, बिस्मिल्लाह खान जैसों ने आगे बढाया और जिसे काशीनाथ सिंह जैसे साहित्यकार वर्तमान में और परवान चढा रहे हैं...
बनारस खास का नहीं, आम का... सबका शहर है... सबके लिए है... हमारे धर्मग्रन्थों मे लिखा है कि कोई कहीं जाए या न जाए, उसे एक बार काशी जरुर जाना चाहिए... और काशी में आकर कहीं नहीं जाना चाहिए... सच बात है, लेकिन उससे भी बडा सच यह है कि जिसने बनारस को देख लिया... बनारस को जान लिया... बनारस उससे कभी छूट नहीं सकता चाहे वह कहीं भी रहे... तभी तो बनारस में रहने वाले और बनारस को जानने समझने वाले एक ही स्वर में दुहराते हैं कि जो मजा बनारस में, वह मजा न पेरिस में न फारस में...
(ये आलेख मैंने पहले भी यहां डाला था... फिर से इसलिए यहां पोस्ट किया कि बनारस के बारे में जितना पढ़िए-सुनिए हर बार कुछ नया सीखने को मिलता है...)